Raag Sriraag•Guru Nanak Dev ji•Ang 25
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Siree Raag, First Mehl, Fourth House:
You are the River, All-knowing and All-seeing. I am just a fish-how can I find Your limit?Wherever I look, You are there. Outside of You, I would burst and die. ||1||
I do not know of the fisherman, and I do not know of the net.But when the pain comes, then I call upon You. ||1|| Pause ||
You are present everywhere. I had thought that You were far away.Whatever I do, I do in Your Presence.You see all my actions, and yet I deny them.I have not worked for You, or Your Name. ||2||
Whatever You give me, that is what I eat.There is no other door-unto which door should I go?Nanak offers this one prayer:This body and soul are totally Yours. ||3||
He Himself is near, and He Himself is far away; He Himself is in-between.He Himself beholds, and He Himself listens. By His Creative Power, He created the world.Whatever pleases Him, O Nanak-that Command is acceptable. ||4||31||
Hindi Translation (हिंदी अनुवाद)
हे प्रभु! तू (एक) दरिया के (समान) है, मैं (तेरे में रहने वाली) एक छोटी सी मछली हूं। मैं तेरा आखिरी छोर नहीं ढूंढ सकती। (मेरी हालत) तू ही जानता है, तू ही (नित्य) देखता है। मैं (मछली और दरिया में) जहां देखती हूं उधर तू ही तू (दरिया ही दरिया) है। अगर मैं दरिया में से बाहर निकल जाऊँ, तो उस वक्त तड़फ के मर जाती हूं (मेरा जीवन तेरे ही आसरे है)।1।
(हे दरिया रूपी प्रभु! तुझसे विछोड़ने वाले) ना मुझे माछी की समझ है, ना ही एसके जाल की (उनसे बचना मेरे बस की बात नहीं)। (तुझसे बिछोड़ने के वास्ते) जब मुझे कोई (आत्मिक) दुख व्यापता है, तो मैं तुझे याद करती हूं।1। रहाउ।
हे प्रभु! तू (इस जगत में) हर जगह मौजूद है। मैंने तुझे कहीं दूर बसा हुआ समझा हुआ है (असलीयत ये है कि) जो कुछ मैं करता हूँ, वह तेरी हजूरी में ही कर रहा हूँ। तू सब कुछ देखता है। (फिर भी) मैं अपने किये काम से मुकर जाता हूँ। मैं ना उस काम में लगता हूँ जो तुझे स्वीकार हों, ना ही मैं तेरे नाम में जुड़ता हूँ।2।
हे प्रभु! जो कुछ तू मुझे देता है, मैं वही खाता हूँ। कोई और दरवाजा नहीं है जहां मैं जाऊँ (और सवाली बनूँ)। नानक सिर्फ इतनी विनती करता है कि ये जीवात्मा तेरी ही दी हुई हैये शरीर भी तेरा ही दिया हुआ है, ये सब कुछ तेरे ही आसरे रह सकता है।3।
प्रभु खुद ही हरेक जीव के नजदीक है, खुद ही दूर भी है। खुद ही सारे जगत में मौजूद है। प्रभु खुद ही हरेक जीव की संभाल करता है, खुद ही हरेक की अरजोई सुनता है, खुद ही अपनी कुदरत से सत्ता से जगत को पैदा करता है। हे नानक! जो हुकमउसको ठीक लगता है, वही हरेक जीव को स्वीकार करना पड़ता है।4।31।
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