Raag Sriraag•Guru Nanak dev ji•Ang 25
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Siree Raag, First Mehl, Fourth House:
There is one awareness among all created beings.None have been created without this awareness.As is their awareness, so is their way.According to the account of our actions, we come and go in reincarnation. ||1||
Why, O soul, do you try such clever tricks?Taking away and giving back, God does not delay. ||1|| Pause ||
All beings belong to You; all beings are Yours. O Lord and Master,How can You become angry with them?Even if You, O Lord and Master, become angry with them,Still, You are theirs, and they are Yours. ||2||
We are foul-mouthed; we spoil everything with our foul words.You weigh us in the balance of Your Glance of Grace.When one's actions are right, the understanding is perfect.Without good deeds, it becomes more and more deficient. ||3||
Prays Nanak, what is the nature of the spiritual people?They are self-realized; they understand God.By Guru's Grace, they contemplate Him;Such spiritual people are honored in His Court. ||4||30||
Hindi Translation (हिंदी अनुवाद)
जितने भी जीव हैं (इन सबके अंदर) एक परमात्मा की ही बख्शी हुई सूझ काम कर रही है, (परमात्मा ने) कोई भी ऐसा जीव पैदा नहीं किया जिसे सूझ से वंचित रखा हो। जैसी सूझ (प्रभु जीवों को देता है) वैसा ही जीवन रास्ता वे पकड़ लेते हैं। (उसी मिली सूझ अनुसार) जीव (जगत में) आते हैं और (यहां) से चले जाते हैं। ये मर्यादा चलाने वाला प्रभु खुद ही है।1।
: हे जीव! तू (अपनी अच्छी सूझ दिखाने के लिए) क्यूँ चालाकी करता है? वह परमात्मा ही (जीवों को सूझ) देता है और ले भी लेता है। रत्ती मात्र भी समय नहीं लगाता।1। रहाउ।
हे जीव! तू (अपनी अच्छी सूझ दिखाने के लिए) क्यूँ चालाकी करता है? वह परमात्मा ही (जीवों को सूझ) देता है और ले भी लेता है। रत्ती मात्र भी समय नहीं लगाता।1। रहाउ।
हे मालिक प्रभु! सारे जीव तेरे पैदा किये हुए हैं। सभी जीवों का तू ही पति है। (अगर जीव तुझसे मिली सूझ अक्ल का गुमान भी करें फिर भी तू) गुस्से में नहीं आता (क्योंकि आखिर ये जीव तेरे ही हैं)। हे मालक प्रभु! अगर तू गुस्से में भी आये (तो किस पे आए?) तू उनका मालिक है वो सारे तेरे ही बनाये हुए हैं।2।
(हे प्रभु!) हम जीव बड़बोले हैं, (तुझसे मिली सूझ अकल पर मान करके अनेक बार) फीके बोल बोल देते हैं। पर तू (हमारे कुबोलों को) मेहर की निगाह से परखता है। (गुरु के द्वारा बताए रास्ते पर चल के) जिस मनुष्य के अंदर ऊँचा आचरण बन जाता है उसकी सोच-समझ भी गंभीर हो जाती है (और वह बड़बोला नहीं बनता)। ऊँचे आचरण के बगैर आदमी की सूझ-बूझ भी नीची ही रहती है।3।
नानक बेनती करता है: असल ज्ञानवान मनुष्य वह है जो अपने असल को पहचानता है, जो उस परमात्मा को ही (अक्लदाता) समझता है। जो गुरु की मेहर से (अपनी चतुराई छोड़ के बुद्धि-दाता प्रभु के गुणों का) विचार करता है। ऐसा ज्ञानवान मनुष्य प्रभु की हजूरी में स्वीकार हो जाता है।4।30।
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