Raag Sriraag•Guru Nanak Dev ji•Ang 18,19
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Siree Raag, First Mehl:
The life of the discarded bride is cursed. She is deceived by the love of duality.Like a wall of sand, day and night, she crumbles, and eventually, she breaks down altogether.Without the Word of the Shabad, peace does not come. Without her Husband Lord, her suffering does not end. ||1||
O soul-bride, without your Husband Lord, what good are your decorations?In this world, you shall not find any shelter; in the world hereafter, being false, you shall suffer. ||1|| Pause ||
The True Lord Himself knows all; He makes no mistakes. He is the Great Farmer of the Universe.First, He prepares the ground, and then He plants the Seed of the True Name.The nine treasures are produced from Name of the One Lord. By His Grace, we obtain His Banner and Insignia. ||2||
Some are very knowledgeable, but if they do not know the Guru, then what is the use of their lives?The blind have forgotten the Naam, the Name of the Lord. The self-willed manmukhs are in utter darkness.Their comings and goings in reincarnation do not end; through death and rebirth, they are wasting away. ||3||
The bride may buy sandalwood oil and perfumes, and apply them in great quantities to her hair;She may sweeten her breath with betel leaf and camphor,But if this bride is not pleasing to her Husband Lord, then all these trappings are false. ||4||
Her enjoyment of all pleasures is futile, and all her decorations are corrupt.Until she has been pierced through with the Shabad, how can she look beautiful at Guru's Gate?O Nanak, blessed is that fortunate bride, who is in love with her Husband Lord. ||5||13||
Hindi translation
(हिंदी अनुवाद)
जो भाग्यहीन जीव-स्त्री (प्रभु-पति के बिना माया आदि) और दूसरे प्यार में ठगी रहती है उसका जीना धिक्कार ही है। जैसे कल्लर की दीवार (धीरे-धीरे) झर-झर के नष्ट होती है, वैसे ही उसका आत्मिक जीवन भी दिन रात (माया के मोह में) धीरे धीरे क्षय हो जाता है। (सुख की खातिर वह दौड़-भाग करती है, पर) गुरु की शरण के बिना सुख नहीं मिल सकता (माया का मोह तो बल्कि दुख ही दुख पैदा करता है, और) प्रभु-पति को मिले बिना मानसिक दुख दूर नहीं होता।1।
हे मूर्ख जीव-स्त्री! अगर पति ना मिले तो श्रृंगार करने का कोई लाभ नहीं होता। (अगर जीव-स्त्री प्रेम से वंचित रह के ही धार्मिक उद्यम कर्म आदि किये जा रही है, पर उसके अंदर माया मोह प्रबल है) वह प्रभु के दर पर प्रभु के घर में आसरा नहीं ले सकती, (क्योंकि) झूठ (भाव, माया का मोह) प्रभु की हजूरी में दुरकारा ही जाता है।1। रहाउ।
(किसान अपने रोजमर्रा के तजरबे से जानता है कि बीज बीजने से पहले धरती को कैसे तैयार करना है ता कि बढ़िया फसल हो, इसी तरह) सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा बड़ा किसान है, वह (बड़ा) सुजान किसान है, वह गलती नहीं करता (जिस हृदय-रूपी धरती में नाम-बीज बीजना होता है) वह उस हृदय-धरा को पहले अच्छी तरह से तैयार करता है फिर उसमें सच्चे नाम का बीज बोता है। वहाँ नाम उगता है, (मानों) नौ खजाने पैदा हो जाते हैं, प्रभु की मेहर से (उस हृदय में की मेहनत) स्वीकार हो जाती है।2।
जो मनुष्य जानबूझ के गुरु (की प्रतिभा) को नहीं समझता उसका सारा जीवन ढंग व्यर्थ है, (आत्मिक रौशनी के पक्ष से अगर परखें तो) उस अंधे ने प्रभु का नाम बिसारा है, अपने मन के पीछे चलने वाले के (जीवन में) अंधकार ही अंधकार रहता है। उसका जन्म-मरण का चक्कर नहीं खतम होता, वह नित्य पैदा होता है मरता है, पैदा होता है, मरता है, और खुआर होता रहता है।3।
(किसी स्त्री ने अपने पति को प्रसन्न करने के लिए अपने शारीरिक श्रृंगार के वास्ते) खरीद के चंदन मंगाया, केसर मंगाया, सिर के केसों को सुंदर बनाने के लिए मांग का सिंदूर मंगवाया, इत्र, चंदन व अन्य सुगन्धियां मंगवाईं, पान मंगवाए और कपूर मंगवाया, पर अगर वह स्त्री पति को (फिर भी) अच्छी ना लगी, तोउस के वह दिखावे के सारे उद्यम व्यर्थ हो गये, (आडंबर बनके रह गये)। (यही हाल जीव-स्त्री का है, पति-प्रभु दिखावे के धार्मिक कर्मों, उद्यमों से नहीं रीझता)।4।
जब तक मनुष्य का मन गुरु के शब्द (तीर) से विच्छेदित नहीं होता, तब तक गुरु के दर पे शोभा नहीं मिलती, ऐसे मनुष्य के द्वारा बरते गये सारे सुंदर पदार्थ व्यर्थ चले जाते हैं (क्योंकि, पदार्तों को भोगने वाला शरीर तो आखिर में राख हो जाता है) सारी शारीरिक सजावटें भी बेकार हो जाती हैं। हे नानक! वही भाग्यशाली जीव-स्त्रीयां मुबारक हैं जिनका प्रभु-पति सेप्रेम बना रहता है।5।13।
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Comments
Waheguru ji
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