Raag sriraag•Guru Nanak dev ji•Ang 15,16
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Siree Raag, First Mehl:
The Great Giver has given the intoxicating drug of falsehood.The people are intoxicated; they have forgotten death, and they have fun for a few days.Those who do not use intoxicants are true; they dwell in the Court of the Lord. ||1||
O Nanak, know the True Lord as True.Serving Him, peace is obtained; you shall go to His Court with honor. ||1|| Pause ||
The Wine of Truth is not fermented from molasses. The True Name is contained within it.I am a sacrifice to those who hear and chant the True Name.Only one who obtains a room in the Mansion of the Lord's Presence is deemed to be truly intoxicated. ||2||
Bathe in the waters of Goodness and apply the scented oil of Truth to your body,And your face shall become radiant. This is the gift of 100,000 gifts.Tell your troubles to the One who is the Source of all comfort. ||3||
How can you forget the One who created your soul, and the praanaa, the breath of life?Without Him, all that we wear and eat is impure.Everything else is false. Whatever pleases Your Will is acceptable. ||4||5||
Hindi Translation (हिंदी अनुवाद)
देनहार प्रभु ने स्वयं ही जगत को मोह रूपी अफीम का गोला जीवों को दिया हुआ है। (इस मोह अफीम को खा के) मस्त हुई जीवात्मा ने मौत को भुला दिया है, चार दिन की जिंदगी में रंग-रलियां मना रही है। जिन्होंने मोह का नशा त्याग के प्रमात्मा के दर पर पहुँचने की कोशिश की है, उन्हें स्थाई प्रभु मिल गया।1।
हे नानक! सदा कायम रहने वाले परमात्मा के साथ सच्ची सांझ बना जिसका स्मरण करने से सुख मिलता है। (और अरदास कर कि हे प्रभु! अपना नाम दे जिस करके) तेरी हजूरी में आदर मिल सके।1। रहाउ।
सदा की मस्ती कायम रखने वाली शराब गुड़ के बिना ही तैयार की जाती है। उस (शराब) में प्रभु का नाम होता है (प्रभु का नाम ही शराब है जो दुनिया से बेपरवाह कर देता है)। मैं उन लोगों से सदके हूँ जो प्रभु का नाम सुनते व उचारते है। मन को तभी मस्त हुआ जानों, जब ये प्रभु की याद में टिक जाए (और मन टिकता है नाम जपने की बरकत से)।2।
प्रमात्मा का नाम व महिमा बाकी सभी दातों से बेहतर दात है। महिमा से ही मनुष्य का मुँह सुंदर लगता है। प्रभु के नाम और महिमा ही (मुख उज्जवल) करने के लिए पानी है, और (महिमा की बरकत से बना हुआ) स्वच्छ आचरण शरीर पर लगाने वाली सुगंधि है। दुखों की निर्वर्ती और सुखों की प्राप्ति की अरजोई परमात्मा के आगे ही करनी चाहिए।3।
जिस प्रभु की बख्शी हुई ये जिंदगी हैं, उसे कभी मन से भुलाना नहीं चाहिये। प्रभु को विसार के, खाने-पीने का सारा ही उद्यम मन को और-और मलीन करता है। (क्योंकि) और सारी बातें (मन को) नाशवान संसार के मोहपाश में फंसाती हैं। (हे प्रभु!) वही उद्यम ठीक है जो तेरे साथ प्रीत बनाता है।4।5।
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Waheguru ji
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