japji sahib•Guru Nanak Dev ji•Ang 5,6
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japji sahib pauree 26:
Priceless are His Virtues, Priceless are His Dealings.Priceless are His Dealers, Priceless are His Treasures.Priceless are those who come to Him, Priceless are those who buy from Him.Priceless is Love for Him, Priceless is absorption into Him.Priceless is the Divine Law of Dharma, Priceless is the Divine Court of Justice.Priceless are the scales, priceless are the weights.Priceless are His Blessings, Priceless is His Banner and Insignia.Priceless is His Mercy, Priceless is His Royal Command.Priceless, O Priceless beyond expression!Speak of Him continually, and remain absorbed in His Love.The Vedas and the Puraanas speak.The scholars speak and lecture.Brahma speaks, Indra speaks.The Gopis and Krishna speak.Shiva speaks, the Siddhas speak.The many created Buddhas speak.The demons speak, the demi-gods speak.The spiritual warriors, the heavenly beings, the silent sages, the humble and serviceful speak.Many speak and try to describe Him.Many have spoken of Him over and over again, and have then arisen and departed.If He were to create as many again as there already are,Even then, they could not describe Him.He is as Great as He wishes to be.O Nanak, the True Lord knows.If anyone presumes to describe God,He shall be known as the greatest fool of fools! ||26||
Hindi Translation (हिंदी अनुवाद)
निरंकार के जिन गुणों को कथन नहीं किया जा सकता वे अमूल्य हैं, और इस निरंकार का सुमिरन अमूल्य व्यापार है ।यह सुमिरन रूपी व्यापार का मार्गदर्शन करने वाले संत भी अमूल्य व्यापारी हैं और उन संतों के पास जो सद्गुणों का भण्डार है वह भी अमूल्य है ।जो व्यक्ति इन संतों के पास प्रभु-मिलाप हेतु आते हैं वे भी अमूल्य हैं और इनसे जो गुण ले जाते हैं वे भी अमूल्य हैं ।परस्पर गुरु-सिख का प्रेम अमूल्य है, गुरु के प्रेम से आत्मा को प्राप्त होने वाला आनंद भी अमूल्य है ।अकाल-पुरुष का न्याय भी अमूल्य है, उसका न्यायालय भी अमूल्य है ।अकाल पुरुष की न्याय करने वाली तुला अमूल्य है, और जीवों के अच्छे-बुरे कर्मों को तोलने हेतु परिमाण (तौल) भी अमूल्य है ।अकाल पुरुष द्वारा प्रदान किए जाने वाले पदार्थ भी अमूल्य हैं और उन पदार्थों का चिन्ह भी अमूल्य है ।निरंकार की जीव पर होने वाली कृपा भी अमूल्य है तथा उसका आदेश भी अमूल्य है ।वह परमात्मा अति अमूल्य है उसका कथन घनिष्ठता से कर पाना असम्भव है ।परंतु फिर भी अनेक भक्त जन उसके गुणों का व्याख्यान करके अर्थात् उसकी स्तुति कर-करके भूत, भविष्य व वर्तमान काल में उसमें लिवलीन हो रहे हैं ।चारों वेद व अट्ठारह पुराणों में भी उसकी महिमा कही गई है ।उनको पढ़ने वाले भी अकाल-पुरुष का व्याख्यान करते हैं ।सृष्टिकर्ता ब्रह्मा व स्वर्गाधिपति इन्द्र भी उसके अमूल्य गुणों को कथन करते हैं ।गिरिधर गोपाल कृष्ण तथा उसकी गोपियाँ भी उस निरंकार का गुणगान करती हैं ।महादेव तथा गोरख आदि सिद्ध भी उसकी कीर्ति को कहते हैं ।उस सृष्टिकर्ता ने इस जगत् में जितने भी बुद्धिमान किए हैं वे भी उसके यश को कहते हैं ।समस्त दैत्य व देवतादि भी उसकी महिमा को कहते हैं ।संसार के सभी पुण्य-कर्मी मानव, नारद आदि ऋषि-मुनि तथा अन्य भक्त जन उसकी प्रशंसा के गीत गाते हैं ।कितने ही जीव वर्तमान में कह रहे हैं, तथा कितने ही भविष्य में कहने का यत्न करेंगे ।कितने ही जीव भूतकाल में कहते हुए अपना जीवन समाप्त कर चुके हैं ।इतने तो हम गिन चुके हैं यदि इतने ही और भी साथ मिला लिए जाएँ ।तो भी कोई किसी साधन से उसकी अमूल्य स्तुति कह नहीं सकता ।जितना स्व-विस्तार चाहता है उतना ही विस्तृत हो जाता है ।श्री गुरु नानक देव जी कहते हैं कि वह सत्य स्वरूप निरंकार ही अपने अमूल्य गुणों को जानता है ।यदि कोई निरर्थक बोलने वाला परमेश्वर का अंत कहे कि वह इतना है|तो उसे महामूखों में अंकित किया जाता है॥ २६ ॥
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